अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और स्त्री सशक्तीकरण

सर्व प्रथम उन्होंने महिला अधिकारों के समर्थन में एक सम्मेलन आयोजित करने का निश्चय किया। 1848 में माट, स्टैंटन और अन्य तीन महिलाओं ने सेनका फाल्स का आयोजन किया जो पहला महिला अधिकार सम्मेलन था। उक्त सम्मेलन में महिलाओं के मताधिकार पर खुलकर चर्चा हुई और मताधिकार के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित हुआ। हालांकि प्रस्ताव पारित होने के दौरान महिलाओं के मताधिकार के सवाल पर मतभेद भी उभर कर सामने आये। बहरहाल मतभेद तथा विरोध के बावजूद महिला अधिकारों के समर्थन में दुनिया के विभिन्न देशों में बौद्धिक विमर्श का एक दौर आया और शिद्दत से आगे बढ़ता रहा। ज्ञातव्य है महिला अधिकार आंदोलन के शुरूआती दिनों में, एजेंडे में महिला मताधिकार, लैंगिक असमानता, शिक्षा, रोज़गार,धार्मिक स्वतंत्रता और एक विवाहित स्त्री का अपनी संपत्ति तथा वेतन पर, अपने बच्चों की देखभाल और अपने शरीर पर नियंत्रण के अधिकार शामिल थे। सच कहा जाए तो स्त्री जाति को लेकर व्यवस्थाजन्य असंतुलन व स्थापित सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ़ महिला अधिकार आंदोलन अपने आप में एक प्रगतिशील विचार था। स्टैंटन, सुसान बी. एंथनी जैसी शख्सियतें महिला अधिकारों के पक्ष में दृढ़ता से खड़ी हुईं और अपने वैचारिक संघर्ष को पूरी शिद्दत से जारी रखा। वैचारिक संघर्ष के क्रम में 1869 में स्टैंटन और एंथनी ने महिलाओं के लिए नेशनल वूमन सफ़रेज एसोसिएशन की स्थापना की। चूंकि स्थापित मान्यताओं के खिलाफ़ एसोसिएशन बना था, इसलिए विरोध के स्वर भी उभर कर सामने आये। 1870-72 के दौरान लगभग 100 महिलाओं ने कोलम्बिया जिले और देश भर के राज्यों में पंजीकरण और मतदान करने का प्रयास किया, चूंकि सुसान बी. एंथनी ने रोचेस्टर व न्यूयॉर्क में पंजीकरण और मतदान की मांग करने वाली जिन 16 महिलाओं के समूह का नेतृत्व किया था, उन सभी 16 महिलाओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और इसी के साथ उन पर भी क़ानूनी कार्रवाई की गयी, जिन्होंने उक्त महिला-समूह का नेतृत्व किया था। हालांकि महिला अधिकारों के समर्थन में विश्व के विभिन्न भागों में बौद्धिक चेतना का एक ज्वार आ चुका था। जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों के समान महिलाओं के भी अधिकार सुरक्षित व सुनिश्चित किए जायें, यह मांग उठने लगी और इसके समर्थन में विश्व के विभिन्न भागों में समय-समय पर हड़ताल तथा आंदोलन होते रहे। 1908 में 1500 महिलाओं ने न्यूयॉर्क में एक भव्य रैली निकाल कर काम के घंटे कम करने, वेतन में सुधार, मताधिकार आदि मांगों के समर्थन में अपनी आवाज़ उठाई। इसका असर यह हुआ कि अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने एक साल के बाद ही इस दिन को पहला महिला राष्ट्रीय दिवस घोषित कर दिया। 8 मार्च 1917 को रूस में महिलाओं ने अपने अधिकारों को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पूरी दृढ़ता के साथ एक ऐतिहासिक हड़ताल की, उसकी अनुगूंज पूरी दुनिया ने सुनी। दरअसल रूसी क्रांति के पहले रूसी महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। लैंगिक विषमता तो समाज में पहले से ही मौजूद थी और साथ ही आर्थिक असंतुलन भी। स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम वेतन मिलते थे और दूसरा शिक्षा के अधिकार से महिलाओं को वंचित कर रखा गया था। राजनैतिक गतिविधियों में भी महिलाओं को भाग लेने की इजाजत नहीं थी। ज़ाहिर है इन्हीं सारे बुनियादी सवालों को लेकर महिलाओं ने 8 मार्च 1917 को हड़ताल कर ज़ार शासन के समक्ष एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। हालांकि इस हड़ताल में शामिल होने वाली अधिकांश महिलाएं उच्च व मध्यम वर्ग की थीं जबकि साधारण परिवार की गरीब महिलाएं परिस्थिति में बदलाव तो चाहती थीं लेकिन अपनी दयनीय हालात के मद्देनजर हड़ताल के पक्ष में नहीं थीं। चूंकि उनके सामने रोजी-रोटी की विकट समस्या थी, हड़ताल उनके लिए मानो अशांति का पर्याय हो और इसलिए उन्होंने हड़ताल का विरोध किया। लेकिन उनका विरोध बेअसर रहा। दरअसल उनकी एकमात्र प्राथमिकता रोजगार और शांति थी। 8 मार्च 1917 अर्थात प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूसी महिलाओं ने रूसी शासक ज़ार के खिलाफ़ ब्रेड एण्ड पीस (रोटी और शांति) की मांग करते हुए बड़ी संख्या में सेंट पीटर्सबर्ग में एक मार्च निकाला। महिलाओं के मार्च का असर यह रहा कि सम्राट निकोलस को अपना पद छोड़ना पड़ा और अंतरिम सरकार जो बनी, उसने महिलाओं के मताधिकार की मांग मान ली। इस प्रकार रूसी महिलाओं की हड़ताल ने ज़ारशाही का अंत कर दुनियाभर के महिलाओं के समक्ष महिला-शक्ति का एक अभूतपूर्व दृष्टांत पेश किया। इसी के बाद से 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के तौर पर विश्व इतिहास में सम्मान हासिल हुआ और 1975 में 8 मार्च के दिन को यू.एन ने आधिकारिक तौर पर महिला दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की। महिला दिवस कैसे अस्तित्व में आया, यह रहा इसका अति संक्षिप्त इतिहास। महिला दिवस के अवसर पर स्त्री-सशक्तीकरण का तात्पर्य भी स्पष्ट हो जाना चाहिए। स्त्रियों के सर्वांगीण विकास से हम क्या समझते हैं। स्त्रियों को उस लायक बनाना जो अपने जीवन से जुड़े सभी ज़रूरी फैसले ले सकें। सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक चेतना संपन्न स्त्रियां भी जब पाखंडी धर्म-गुरुओं, तांत्रिकों, मुल्लाओं व लंपट बाबाओं के यहां दरबार लगाते दिख रही हों, तो ज़ाहिर है स्त्री सशक्तीकरण को लेकर राज्य की भूमिका पर सवाल खड़े होते हैं। एक ओर राज्य जहां अंधविश्वास और फिरकापरस्ती को सुनियोजित साजिश के तहत बढ़ाने के कृत्य में संलिप्त हो और दूसरी ओर नारी अधिकारों की बात करते दिखे और स्त्री-सशक्तीकरण पर जोर दे तो हमें सतर्क हो जाना चाहिए। स्त्री-सशक्तीकरण के लिए आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता ही यथेष्ट नहीं है, बेशक यह ज़रूरी है किन्तु यथेष्ट नहीं, बल्कि सही अर्थ में स्त्री-सशक्तीकरण तभी फलीभूत हो सकता है जब स्त्री-समाज को आर्थिक और बौद्धिक तौर मजबूत बनाने के साथ ही उसे वैज्ञानिक चेतना से लैस किया जाए,अन्यथा लक्ष्य को हासिल कर पाना हमारे लिए कठिन साबित होगा।


Follow Us
About Us | Contact Us | Advertise with Us | Terms of Use | Feedback | Cookie Policy | Privacy policy

Copyright @2020 The Sun Express

Designed & Developed By AY Goaltech Infotech Private Limited