संपादकीय

राज्य-राजनीति में फासीवाद की तेज़ होती पदध्वनि

पश्चिम बंगाल के रानीगंज में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की आदमकद प्रतिमा को 12 जुलाई 2026 की रात जेसीबी मशीन की सहायता से उसके आधार सहित उखाड़कर हटाए जाने की घटना केवल एक स्मारक को क्षति पहुँचाने का मामला नहीं है।

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दार्जिलिंग व उप-हिमालयी मैदानी इलाकों, तराई और डुवार्स के चाय बागानों की बुनियादी समस्याएं एवं समाधा

उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग और डुवार्स में चाय की खेती का एक अत्यंत रोचक इतिहास है। ज्ञातव्य है कि ब्रिटिश भारत में सबसे पहले चाय की खेती सन् 1841 में शुरू हुई। इस्ट इण्डिया कम्पनी के एक वरिष्ठ अधिकारी डा. आर्ची बाल्ड कैंपबेल ने दार्जिलिंग के बीचबूड (Beechwood) में चीन से चुराकर लाये गये चाय के बीज बोये और वे अपने उद्देश्य में कुछ हद तक सफल रहे। अपनी आंशिक सफलता से उत्साहित होकर डा. कैंपबेल ने अपने पिछले अनुभवों को अपडेट करते हुए 1850 के दशक में व्यवसायिक स्तर पर विधिवत चाय-बागानों की शुरुआत की।

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बंगाल विधान सभा चुनाव और इसके निहातार्थः

…जिन्दा रह गये तो अगली बार वोट दे देना ! SIR को जहां संविधान स्पष्ट तौर पर संविधान विरोधी घोषित किया जाना चाहिए, वहीं सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि अगर जिन्दा रह गये तो अगली बार अपना वोट दे देना,क्या प्रजातंत्र पर चोट करना नहीं है-

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सांसद हर्षवर्धन शृगला ने दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे को बचाने के लिए संसद में प्रस्ताव रखे

संसद में गहरे सांस्कृतिक और क्षेत्रीय महत्व का एक मुद्दा उठाते हुए, सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला ने आज दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे को बचाने के लिए तत्काल और लगातार हस्तक्षेप की मांग की।

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सिलीगुड़ी, महानंदा, और एक बढ़ता हुआ जियो-एनवायरनमेंटल संकट---

1698 में, जॉब चारनॉक ने उस समय के ज़मींदारों, सबर्णा रॉय चौधरी से सुतनुती, गोबिंदपुर और कालीकाता गाँव खरीदे। इस काम को आम तौर पर कलकत्ता शहर की नींव माना जाता है। अगर हम इसी तरह का ऐतिहासिक लॉजिक इस्तेमाल करें, तो एक ज़रूरी सवाल उठता है: हमें सिलीगुड़ी की नींव कब रखनी चाहिए?

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और स्त्री सशक्तीकरण

ज्ञातव्य है कि 1840 में ल्यूकेटिया मार्ट और एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन अपने पतियों के साथ विश्व गुलामी सम्मेलन में शामिल होने के लिए लंडन गयीं। चूंकि उन दिनों महिलाओं के अधिकार बहुत सीमित थे, इसलिए उन्हें सम्मेलन में शामिल होने की अनुमति नहीं मिली। बेशक माट और स्टैंटन की वैचारिक दोस्ती को वहीं परवान चढ़ी और उन दोनों ने उसी वक्त यह तय किया कि महिलाओं के अधिकारों को लेकर उनका संघर्ष जारी रहेगा।

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