सांसद हर्षवर्धन शृगला ने दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे को बचाने के लिए संसद में प्रस्ताव रखे
दार्जिलिंग ट्वाय ट्रेन भारत की सबसे प्रतिष्ठित विरासत संपत्तियों में से एक है और UNESCO की विश्व धरोहर स्थल भी है। ट्वाय ट्रेन के ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व पर प्रकाश डालते हुए, श्री शृ्ंगला ने कहा कि 140 से अधिक वर्षों से, इस रेलवे ने न केवल न्यू जलपाईगुड़ी को दार्जिलिंग से जोड़ा है, बल्कि यह पहाड़ी क्षेत्रों की पहचान का एक विशिष्ट प्रतीक और वैश्विक पर्यटन के लिए एक प्रमुख आकर्षण भी रहा है। उन्होंने आगाह किया कि अपनी समृद्ध विरासत के बावजूद, यह रेलवे अब गंभीर परिचालन और संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिससे इसके अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। रेलवे कॉरिडोर के सिकुड़ने की ओर ध्यान दिलाते हुए, श्री शृ्ंगला ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कैसे अतिक्रमण और बुनियादी ढांचे पर बढ़ते दबाव ने इसकी सुरक्षा और कार्यक्षमता, दोनों को प्रभावित किया है। उन्होंने आगे भूस्खलन और भारी बारिश के कारण इस मार्ग की बढ़ती संवेदनशीलता की ओर भी इशारा किया, जिससे अक्सर रेल की पटरियों को नुकसान पहुँचता है और सेवाएँ बाधित होती हैं। उन्होंने कहा कि भाप से चलने वाले इंजनों के पुराने बेड़े को विशेष रखरखाव और निरंतर निवेश की आवश्यकता है, जिसे केवल टुकड़ों में किए गए प्रयासों से पूरा नहीं किया जा सकता। विकास भी, विरासत भी के दृष्टिकोण का आह्वान करते हुए, श्री शृ्ंगला ने इस बात पर ज़ोर दिया कि विकास और विरासत का संरक्षण साथ-साथ चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे इसी संतुलन का एक जीवंत उदाहरण है और यह एक सुव्यवस्थित तथा भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण का हकदार है। उन्होंने एक व्यापक राष्ट्रीय-स्तरीय संरक्षण रणनीति की मांग की, जिसमें समर्पित वित्तपोषण, बुनियादी ढांचे की बहाली, कॉरिडोर की सुरक्षा और आपदा शमन के मज़बूत तंत्र शामिल हों। उन्होंने रणनीतिक पर्यटन संवर्धन के माध्यम से इस रेलवे को एक नई पहचान दिलाने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया, और इसे स्थानीय संस्कृति, आजीविका तथा सामुदायिक भागीदारी से जोड़ने का सुझाव दिया। श्री शृ्ंगला ने इस बात पर प्रकाश डाला कि स्थानीय हितधारकों—जिनमें स्वयं सहायता समूह और पर्यटन संचालक शामिल हैं-को इस प्रक्रिया में शामिल करने से रोज़गार के नए अवसर खुल सकते हैं, और साथ ही ज़मीनी स्तर पर लोगों में अपनेपन की भावना भी मज़बूत होगी। उन्होंने विरासत के संरक्षण और आधुनिक रखरखाव की पद्धतियों, दोनों ही क्षेत्रों में युवाओं और रेलवे कर्मचारियों के लिए कौशल विकास के महत्व को भी रेखांकित किया। अपने संबोधन के दौरान कहा, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का संरक्षण केवल एक परिवहन प्रणाली को बचाने तक ही सीमित नहीं है। यह एक जीवंत विरासत और पहाड़ी क्षेत्रों की पहचान को सुरक्षित रखने का भी एक प्रयास है। उनके हस्तक्षेप ने टॉय ट्रेन के भविष्य पर राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर से ध्यान केंद्रित किया है, और भारत की सबसे अनमोल पहाड़ी रेलों में से एक को सुरक्षित करने के उद्देश्य से नीतिगत कार्रवाई के लिए मंच तैयार किया है।
Copyright @2020 The Sun Express