बंगाल विधान सभा चुनाव और इसके निहातार्थः

LOGICAL DISCREPANCIES अर्थात तार्किक गड़बड़ी के नाम पर एक ही झटके में 27 लाख से अधिक वैध मतदाताओं को उनके नागरिक अधिकार से वंचित करते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि अगली बार वोट डाल देना..., क्या शीर्ष-सत्ता के समक्ष उसका यह साष्टांग समर्पण नहीं है? जब एक-एक कर देश की तमाम संवैधानिक संस्थाएं लंपट पूंजी और निरंकुश सत्ता के समक्ष अपने घुटने टेक रही हों, तब सुप्रीम कोर्ट का लंपट सत्ता के आगे कमजोर पड़ते जाना अथवा घुटने टेकने को लेकर मैं ज़रा भी परेशान नहीं हूं। खासकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने निहित स्वार्थ के कारण भारतीय संविघान के बुनियादी ढांचे पर जो गंभीर चोट पहुंचायी थी और उनके बाद जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने भी कई बड़े मामलों में शीर्ष सत्ता के दबाव में आकर संविधान विरोधी कार्य किये और अंततः जस्टिस सूर्यकांत ने भी वही किया, इस बार नहीं तो क्या अगली बार वोट देना…। बेशक मताधिकार एक नागरिक का मौलिक अधिकार है और उसे यह अधिकार हमारे देश का संविधान प्रदान करता है। ज़ाहिर है देश के किसी भी वैध नागरिक का मताधिकार उससे छीन लेना क्या एक संगीन अपराध नहीं है? दरअसल भारत के मुख्य चुनाव आयोग ज्ञानेश कुमार गुप्ता ने अपराध किया, उस अपराध में कहीं न कहीं देश की सर्वोच्च अदालत की भूमिका को क्या हम नजरअंदाज कर सकते हैं? शायद, नहीं। दरअसल इस पतन के यथेष्ट कारण हैं और देश के प्रबुद्ध् नागरिक काफ़ी हद तक कारणों से वाकिफ भी हैं। इधर पिछले दो दशक के दौरान संविधान विरोधी गैरज़रूरी फैसलें बहुतायत में होते रहे हैं। इसलिए यह कोई नयी बात नहीं है। विश्व इतिहास में ऐसे अनेक वाक़ये पहले भी हुए हैं। क्या देश-दुनिया में जब भी ऐसे कठिन हालात पैदा होते हैं और आम-अवाम के समक्ष अनायास ही विकट कठिनाइयां आकर खड़ी हो जाती हैं तो क्या हमारी सारी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। तब भी बहुत कुछ बचा हुआ रहता है। ज़ाहिर है, नये विकल्प कभी खत्म नहीं होते। किसी भी दुष्ट अथवा शैतान को शीर्ष सत्ता तक पहुंचाने वाली जनता व संवैधानिक संस्थानों के निर्माण तथा विकास में अहम भूमिका निभाने वाली शख्सियतें, समाज शुभचिंतक, इंसाफ़पसंद नागरिक एवं संघर्षशील अवाम के बीच से नये विकल्प पैदा होते रहते हैं? सामाजिक अन्याय-अविचार व शोषण-दमन अनंत काल तक अपने मूल रूप में कायम नहीं रह सकता, इतिहास-विज्ञान से मैंने जो कुछ भी सीखा व हासिल किया है उसके आधार पर अपने देश के परिपेक्ष्य में यह बात मैं दृढ़तापूर्वक कह रहा हूं। हमारे निराश होने अथवा डरने की कोई वजह नहीं है। किसी न किसी को मिल का पत्थर तो बनना ही पड़ता है। आवाज़ उठानी पड़ती है,ऐसी आवाज़ जो देश के आम लोगों तक पहुंचे। संकट की गंभीरता और संभावित ख़तरे को समझते हुए संघर्षशील अवाम, चेतनशील नागरिकों व जनपक्षधर सृजन कर्मियों को एक नये विकल्प को लेकर सचेष्ट होना होगा और जहां कहीं भी थोड़े-बहुत प्रगतिशील तत्त्व मिलें, रोशनी दिखे उन्हें अति सतर्कता के साथ सहेज-बटोर कर जनता के न्यायसंगत मांगों के पक्ष में खड़े करने की भूमि तैयार करनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात जो हमें समझनी है, वह यह कि गणतांत्रिक आंदोलनों की ज़मीन अभी पूरी तरह नष्ट नहीं हुई है, बची हुई भूमि का इस्तेमाल करने का यह माकूल समय है। फिलहाल जो क़लमकार अमर काव्य की रचना में अति व्यस्त हैं, उन्हें अमर काव्य की रचना में व्यस्त रहने दें, उनकी चिंता से बाहर निकल कर आप सामाजिक सरोकारों से खुद को जोड़ें और समय की जरूरतों के मद्देनजर अपने सृजन की दिशा तय करें। बेशक यह वक्त चुप रहने का नहीं है। सत्ता के शोषण-दमन, उत्पीड़न, झूठ-फ़रेब और सुनियोजित साज़िशों के खिलाफ़ अपनी क़लम को धारदार बनाने का यह सही वक्त है। निरंकुश सत्ता जब खुद ही अपनी कब्र खोदने में लगी हुई है तो हमें उसके इस काम में उसकी मदद करनी होगी। सही समय पर ही सही निर्णय के किये जाने चाहिए। समय को मुट्ठी में बंद कर क्या रखा जा सकता है, नहीं न? बेशक रेत की तरह वह फिसल जायेगा। और वह आवाज़ भी सही समय पर उठनी चाहिए जो जनता की तंद्रा को भंग कर सके। जाग्रत जन-समूह की फौलादी एकता के समक्ष कभी क्या कोई निरंकुश सत्ता ठहर पायी है, नहीं। ऐसा कोई दृष्टांत इतिहास में मुझे आज़तक नहीं मिला है। फिलहाल इतना ही….


Follow Us
About Us | Contact Us | Advertise with Us | Terms of Use | Feedback | Cookie Policy | Privacy policy

Copyright @2020 The Sun Express

Designed & Developed By AY Goaltech Infotech Private Limited